Essay On Laziness In Hindi – Educational Dose

नमस्ते दोस्तों कैसे हैं आप, एक बार फिर से स्वागत आपका Educational Dose के इस नये पोस्ट ( Essay On Laziness In Hindi ) में , आज आप पढेंगे की आलस्य किसे कहतें है ? और किस तरह से आलस्य मनुष्य को कमजोर बना देता है ? इस पोस्ट ( Essay On Laziness In Hindi ) को आप ध्यान से पढिएगा तो चलिए शुरू करते है |

आलस्य जो मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु हैं| आलस्य एक ऐसा भाव है जो इंसान को कोई भी कार्य करने की अनुमति नहीं देता अर्थात व्यक्ति आलस्य में कोई भी काम नहीं करना चाहता क्योंकि व्यक्ति को आलस्य में कोई भी कार्य नहीं करना अच्छा नहीं लगता बजाए आराम करने के | आलस्य व्यक्ति को कठिनाईयों के मार्ग पे ले जाता है जिससे व्यक्ति का जीवन असफल होने लगता है |

Essay On Laziness In Hindi

मनुष्य का जीवन संघर्ष पूर्ण होता है | जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य आशा -निराशा और जिज्ञासा से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उत्साहित रहता है,बहुत तो उसमे सफल होते है और बहुत व्यक्ति असफल | क्योंकी असफलता का प्रमुख कारण आलस्य , निंदा तथा अपने कार्य के प्रति दृढ़ निश्चय ना करना | वह मनुष्य जो जीवन में काम को टालते रहते है वे कभी सफल नहीं होते केवल निराशा के शिकार होते है इसलिए कहा जाता है आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है |

आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु

हर इंसान को मेहनत करने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिये | एक साल का बच्चा भी मेहनत से चलने की कोशिश करता है चाहे वो कितनी बार गिरे पर वह हार नहीं मानता जब तक वह चलना नहीं सीख जाता | लेकिन आलसी मनुष्य की तो बात ही और है आलसी मनुष्य बस अपने भाग्य के भरोसे जीता है | मेहनत करने में उसे जरा सा भी विश्वास नहीं है | किसी भी इंसान को कभी भी अपने भाग्य के भरोसे नहीं रहना चाहिये |

क्योंकि इंसान का नसीब कब उसे अंगूठा दिखाकर चला जाए पता ही नहीं चलता | ईश्वर ने हमे दो हाथ दो पैर दिए है तो हमे इसका उपयोग करना चाहिये | इतनी सुंदर जिंदगी में आलसी लोग बैठ कर और सो कर अपना जीवन व्यतीत करते हैं सुबह उठने में आलस, हर छोटा बड़ा काम करने में आलस इत्यादि | आलसी व्यक्ति को जीवन में कभी सफलता नहीं मिलती है | कोई कितना भी बोले डांटे लेकिन आलसी व्यक्ति को कोई फर्क ही नहीं पड़ता है | हर कार्य में आलस्य करने लगता है |

इच्छा शक्ति का न होना

इच्छा शक्ति का न होना भी एक आलस का एक प्रमुख कारण है | जब हम किसी भी काम को बिना इच्छा के करते है तो हमारे ऊपर आलस और भी हावी हो जाता है क्योंकि न तो हमारा शरीर उस कार्य को करना चाहता है और न ही हमारा दिमाग बस हम उसे मज़बूरी में करते हैं | तो आलस का हावी होना जायज है | दोस्तों किसी भी कार्य को करने से पहले योजना बनाना चाहिए ताकि उस कार्य को करते समय हम कही भटक न जाए और अगर हम भटकेंगे नहीं तो आलस हम पर हावी नहीं हो सकता |

आलस्य को दूर भागने के कुछ उपाय

  • सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठे
  • पोषण युक्त भोजन करे
  • पर्याप्त नींद ले
  • प्रतिदिन व्यायाम करे
  • अपना वातावरण साफ़ रखे
  • आलस्य हटाकर कुछ उपयोगी कार्य करे
  • रचनात्मक भाव रखे
  • सकारात्मक सोचे

“”काल करे सो आज कर आज करे सो अब पल में प्रलय हो जाएगी बहुरि करेगा कब | “”

अर्थात . कबीर दास जी कहते है की कभी भी किसी कार्य को कल पर नहीं छोड़ना चाहिए जो कार्य कल करना है उस कार्य को आज ही कर लो और जो आज करना है उसे अभी कर लो | किसी को भी पता नहीं है की कब प्रलय आ सकता है और जीवन का अंत हो सकता है फिर जो बचा कार्य है वो कब करोगे | जिस तरह लोहे के ठन्डे पड़ जाने पर हथोडा पटकने से कोई फायदा नहीं होता उसी तरह एक बार समय निकल जाने पर हमे कोई लाभ नहीं मिलेगा सिवाय निराशा के |

कुल मिलकर यह कह सकते है की समय बहुत ही मूल्यवान है | इसका उपयोग सही ढंग से करे अपना जीवन आलस्य में व्यतीत मत करे और अपने जीवन को बेहतर बनाइये | आलसी व्यक्ति को छोटे कार्य करने के लिए भी किसी न किसी की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि वह आलस्य के जाल में इस तरह से फंसा रहता है की उसे बस आराम चाहिए | वह बिलकुल भी मेहनत नहीं करना चाहता है | वह अपने आराम के समय में किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहता है और ऐसे ही अपना सारा जीवन व्यतीत करना चाहता है |

आलस्य की एक कहानी

एक बहुत ही विद्द्वान गुरु जी थे | उनके कई सारे शिष्य भी थे और वे अपने शिष्यों से बहुत प्रेम भी करते थे | वे कभी भी किसी का अहित नहीं चाहते थे | वो अपने शिष्यों को हमेशा धर्म के मार्ग पर चलने की सीख देते थे | पर उन्ही शिष्यों में से एक शिष्य बहुत ही आलसी प्रवृत्ति का था |

वह अपना हर कार्य कल पर छोड़ देता था और उसके इस कार्य से गुरुदेव जी बहुत ही परेशान रहते थे | एक बार गुरु जी ने उसे सही रास्ते पर लाने के लिए एक योजना बनाई | उन्होंने उस शिष्य को एक पत्थर दिया और कहा की इस पत्थर को तुम जिस भी लोहे की वस्तु पर इस पत्थर से स्पर्श करोगे वह वस्तु सोने की बन जाएगी |

शिष्य को यह बात जानकर बहुत ख़ुशी हुई गुरु देव ने कहा की मै किसी कार्य से दो दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ | तब तक तुम इस पत्थर का ख्याल रखना मै दो दिन बाद आकर इस पत्थर को तुम से ले लूंगा | ये कहके गुरु जी बाहर चले गए | यह सुनकर शिष्य को बहुत ही ख़ुशी हुई | किन्तु आलसी मनुष्य की सोच भी बहुत ही आलसी होती है उसने आज का दिन सोचने में ही बीता दिया की मेरे पास जब इतने सारे स्वर्ण हो जायेंगे तो मै उन्हें खर्च कैसे करूँगा |

मै जब अमीर हो जाऊंगा तो कितना खुश रहूँगा | मेरे पास महल होगा नौकर-चाकर होंगे जमीन होगी बाग़-बगीचे होंगे और मै सिर्फ बैठ कर खाऊंगा और हुकुम चलाया करूँगा इत्यादि |यही सब सोचत- सोचते पूरा दिन बीत गया | और रात में खाना खा कर सो गया और फिर सपने देखने लगा |

फिर दूसरे दिन जब वह सुबह उठा तो उसने सोचा की स्वर्ण बनाने का तो आखिरी दिन है | सूर्यास्त के समय तो गुरु जी वापस आ जायेंगे | आज तो इस पत्थर का उपयोग करना बहुत ही आवश्यक है हालाँकि अभी तो पूरा दिन बचा है | कुटिया में तो बहुत कम लोहा है ऐसा करता हूँ |

मै बाज़ार जाकर लोहे के बड़े बड़े सामान ले आता हूँ लेकिन कौन से सामान खरीद कर लाऊं | ऐसे बड़े बड़े आकर के लोहे खरीदने होंगे जो बहुत भारी हो | ऐसा करता हूँ लोहे के खम्बे ले आता हूँ मगर नही, खम्बो को कुटिया तक लाना बहुत मुश्किल होगा चलो ठीक है ये तो कर ही लेंगे लेकिन उससे पहले खाना खा लेते है |

भोजन करने के बाद उसे आलस्यं आ जाता है और वह सो जाता है और जब उसकी नीद खुलती है तो देखता है की गुरु जी तो कुटिया के तरफ ही आ रहे है अब गुरु jii को देखकर वह बहुत ही घबरा जाता है और उनके पैरो में गिरकर कहता है की मुझे माफ़ करना गुरु जी उस पत्थर को मेरे पास एक दिन और रहने दीजिए | लेकिन गुरुजी उसे साफ़-साफ़ मना कर देते है और कहते है की तुमने एक स्वर्णिम अवसर को गवां दिया है | गुरुजी के मना करने के बाद उस शिष्य के अमीर बनने का सपना चूर-चूर हो जाता है |

इस कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है की जब हमे जीवन में कभी आगे बढ़ने को मिले तो उस अवसर को कभी भी हाथ से जाने नहीं देना चाहिये | आलस्य एक बहुत ही बड़ा रोग है जो एक बार मनुष्य को पकड लेता है | तो सारी उम्र नहीं छोड़ता हैं इसलिए हमेशा आलस्य से दूर रहे और हमेशा मेहनत करे परिश्रम से कभी भी पीछे न भागे |

निष्कर्ष

निष्कर्ष आलसी मनुष्य कभी भी कही भी परिश्रम के महत्व को समझ नहीं सकता और न ही मूल्यवान समय के महत्व को और इसी कारण से वह अपना सम्पूर्ण जीवन व्यर्थ कर देता है और अंत में उसे सिर्फ पछताना पड़ता है जबकि परिश्रमी मनुष्य मूल्यवान समय के महत्व को समझता है और प्रतिदिन अपने परिश्रम से अपने किये हुए कार्यो से अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है | इसलिए हर मनुष्य को सदैव परिश्रम से दोस्ती करना चाहिए और आलस्य से दुश्मनी

क्योंकि परिश्रम थकाता जरूर है किन्तु आलस्य को दूर भागता है |

मुझे आशा है दोस्तों की आप को आज का ये पोस्ट ( Essay On Laziness In Hindi ) पसंद आया होगा | यदि आपको मेरा यह पोस्ट( Essay On Laziness In Hindi ) अच्छा लगा है और इससे आपको कुछ जानने को मिला है और लगता है यह जानकारी अन्य लोगो को भी मिलनी चाहिये तो इसे आप Social Media पर जरूर Share कीजिये जिससे इसकी जानकारी और भी लोगो को मिले और वो भी जाने की आलस्य मनुष्य को कितना कमजोर कर देता है के बारे में….


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