Shringar ras । श्रृंगार रस – भेद, परिभाषा और उदाहरण

Shringar ras । श्रृंगार रस – भेद, परिभाषा और उदाहरण

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दोस्तों आज के इस पोस्ट में हम श्रृंगार रस – भेद, परिभाषा और उदाहरण को बेहतर तरीके से समझने की कोशिश करेंगे, इसको ध्यान से पढ़िए जिससे की आप इसे आसानी से समझ सकें।

ऐसे प्रश्न हर उन परीक्षाओं में जरूर पुछा जाता है, जहाँ पर हिंदी विषय होता है, और बहुत से विद्यार्थी इसको गलत करके भी आते हैं, इसलिए इसको ध्यान से पढ़ें और समझें।

श्रृंगार रस – Shringar ras in hindi

श्रृंगार रस को रसों का राजा (रसराज )भी कहते हैं

  • श्रृंगार दो शब्दों के योग से बना है श्रृंग + आर।
  • श्रृंग का अर्थ है काम की वृद्धि , और आर का अर्थ है प्राप्ति। अर्थात जो काम अथवा प्रेम की वृद्धि करे वह श्रृंगार है।
  • इसके अंतर्गत पति – पत्नी या प्रेमी – प्रेमिका के प्रेम की अभिव्यंजना की जाती है।
  • श्रृंगार का स्थाई भाव दांपत्य रति / प्रेम है।

उदाहरण:-

दूलह श्रीरघुनाथ बने दुलही सिय सुन्दर मन्दिर माहीं।
गावति गीत सबै मिलि सुन्दरि बेद जुवा जुरि बिप्र पढ़ाहीं॥
राम को रूप निहारति जानकि कंकन के नग की परछाहीं।
यातें सबै सुधि भूलि गई कर टेकि रही, पल टारत नाहीं॥

श्रृंगार रस के दो भेद हैं-

1- संयोग श्रृंगार

2- वियोग श्रृंगार

श्रृंगार रस के इन दोनों भेद के द्वारा ही प्रेम के विशाल रूप को प्रकट किया जाता है। प्रेम के व्यापक, उदात्त और इसी मनोवैज्ञानिक दृष्टि के कारण श्रृंगार रस को रसराज भी कहा जाता है।

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1- संयोग श्रृंगार रस – Sanyog shringar ras

संयोग श्रृंगार के अंतर्गत नायक नायिका का परस्पर मिलन होता है। दोनों के द्वारा किए गए क्रियाकलापों को उनके सुखद अनुभूतियों को संयोग श्रृंगार के अंतर्गत माना गया है।

संयोग श्रृंगार के उदाहरण

” हुए थे नैनो के क्या इशारे इधर हमारे उधर तुम्हारे।
चले थे अश्कों के क्या फवारे इधर हमारे उधर तुम्हारे। “

प्रस्तुत पंक्ति में नायक – नायिका के संयोगवश मिलने के कारण दोनों की आंखों में जो बातचीत हुई। उससे अश्रु की धारा निकली , यह संयोग श्रृंगार की प्रबल अनुभूति कराता है।

2- वियोग श्रृंगार रस– Viyog shringar ras

वियोग श्रृंगार को विप्रलंभ श्रृंगार भी माना गया है। वियोग श्रृंगार की अवस्था वहां होती है , जहां नायक – नायिका पति-पत्नी का वियोग होता है। दोनों मिलन के लिए व्याकुल होते हैं , यह बिरह इतनी तीव्र होती है कि सबकुछ जलाकर भस्म करने को सदैव आतुर रहती है।

माना गया है जिस प्रकार सोना आग में तप कर निखरता है , प्रेम भी विरहाग्नि में तप कर शुद्ध रूप में प्रकट होती है।

वियोग श्रृंगार के उदाहरण

” जल में शतदल तुल्य सरसते , तुम घर रहते हम न तरसते

देखो दो – दो मेघ बरसते , मैं प्यासी की प्यासी ……

आओ हो बनवासी। “

प्रस्तुत पंक्ति मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा का विरह वर्णन से लिया गया है।

इसमें नायिका अपने स्वामी के बिरहा अवस्था में अपने पति के लौट आने की आशा करती है। दिन – रात दोनों नेत्रों से अश्रु की वर्षा करती रहती और उनके आगमन की प्रतीक्षा में राह ताकती ।

यह नायिका द्वारा अपने नायक की प्रतीक्षा में प्रेम की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है।

श्रृंगार रस कविता – Shringar ras kavita

1- ना श्वेत श्वेत ना श्याम श्याम
वो सुंदरता की प्रतिमा सी।
अपनी मादक आंखों से
वो मुझमें प्राण जगाती सी।
अपने सुगन्धित केशों में
वो कलियों को महकाती सी।
अनघड़ अनंत सितारों में
वो ‘चंद्रमुखी’ ‘चंदा’ जैसी।
रत्नों के भंडारों में
वो ‘मोती माला’ के जैसी।
हे रूप कामिनी ह्रदय हिरणी
तुम उत्साह को जगाती सी।
‘वीर बहादुर’ कवियों को
तुम ‘श्रृंगार’ पाठ पढाती सी।
हे सुंदर अंतर्मन वाली,
हे चेतन जड़ करने वाली।
तुम ‘श्रृंगार रस’ की जननी सी,
तुम ‘श्रृंगार रस की जननी’ हो।
-पंकज सिंह ‘विधार्थी’

2- तुम्हें जाने इतना क्यों चाहने लगा हूँ
कि चाहत में सब कुछ भुलाने लगा हूँ
मेरा हाल इससे बुरा अब क्या होगा
तेरा नाम लिखने मिटाने लगा हूँ
तुम्हें चाहता हूँ, तुम्हें पूजता हूँ
तुम्हें राज़ दिल के बताने लगा हूँ
मेरी इस ख़ता से खुदा भी ख़फा है
मैं जो तेरे सामने सर झुकाने लगा हूँ
तुम्हें जाने इतना क्यों चाहने लगा हूँ
कभी जिंदगी से शिकायत नही थी
मगर मुझको पल भर की राहत नही थी
मगर जबसे तुमसे मोहौब्बत हुई है
मेरी जिंदगी कुछ सवरने लगी है
कुछ पल सुकूं के मैं भी पाने लगा हूँ
चाहत में तेरी इस जिंदगी से
राहत के कुछ पल चुराने लगा हूँ
तुम्हें जाने इतना क्यों चाहने लगा हूँ
तेरे प्यार में जो सबक मैंने सीखे
तो लगने लगे रंग दुनिया के फीके
हुआ इश्क का कुछ असर मुझ पे ऐसा
मैं दुनिया जहां को भुलाने लगा हूँ
तुम्हें जाने इतना क्यों चाहने लगा हूँ
बहुत उलझनें हैं, बड़ी बेबसी है
मेरी जान उलफ़त में कैसी फंसी है
तुमसे मोहब्बत, हैं तुमसे ही सांसे
तुम्हीं से ही चाहत छुपाने लगा हूँ
तुम्हें जाने इतना क्यों चाहने लगा हूँ
कि चाहत में सब कुछ भूलाने लगा हूँ
– हिमांशु शर्मा

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